“आई एम जागरूक” के बारे मे

अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी जाने

श्रीमती मंजुला सक्सेना
एम.ए, बी.एड
अध्यक्ष
“जागरूक“संस्था

अंकुर सक्सेना
एडवोकेट (हाईकोर्ट) लखनऊ
संयोजक
“आई एम जागरूक”

I AM JAGRUK “जागरूक” संस्था द्वारा संचालित विश्व का प्रथम अभियान है जो KNOW YOUR DUTIES WITH RIGHTS (अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी जाने) की TAG LINE के साथ भारत के नागरिकों को अपने कर्तव्यों के पालन से सशक्त भारत के निर्माण हेतु सजग करने की अनूठी पहल व अभिनव प्रयास हैं। उक्त अभियान का अधिकृत प्रारम्भ 13 सितम्बर 2019 को प्रेस क्लब हजरगंज लखनऊ में समाज के वरिष्ठ व गणमान्य नागरिकों द्वारा किया जा चुका हैं।

अभियान का मुख्य उद्देश्य विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के रूप में विख्यात एवं सामाजिक सांस्कृतिक रूप से विश्वगुरू का दर्जा प्राप्त रहे भारतवर्ष को एक गणतन्त्र के रूप में 71वाॅ वर्ष पूर्ण करने पर भारत के नागरिकों को उनके कर्तव्यों के पालन द्वारा सशक्त भारत के निमार्ण में योगदान हेतु प्रेरित करना हैं। विश्व के समस्त देशों जिन्होंने वर्तमान समय में विकास क्रम में उच्च सोपान हासिल कर रखा हैं या जिन्हें हम विकसित देशों की श्रेणी में रखते हैं यथा अमेरिका, जापान, इंग्लैण्ड एवं रूस आदि यहां के नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के साथ – साथ कर्तव्यों के प्रति विशेष रूप से जागरूक रहते है परन्तु विश्व में जनसंख्या के आधार पर द्वितीय स्थान व श्रमशक्ति के आधार पर विश्व पटल में अपनी धाक जमाने वाले भारत के नागरिक जहां केवल अपने अधिकारों को जानते हैं एवं अधिकारों की प्राप्ति हेतु ही संघर्षरत रहते हैं वही कर्तव्यों का ना तो उन्हें सम्यक् ज्ञान है एवं ना ही कर्तव्यो के सम्यक ज्ञान की दिशा एवं पालनार्थ इच्छाशक्ति ।

कर्तव्यों से क्या तात्पर्य हैः

अब सवाल उठता हैं कि कर्तव्यों से क्या तात्पर्य हैं या कर्तव्यों का क्या अर्थ हैं अथवा यह किस प्रकृति के होते हैं। अनादिकाल से कर्तव्यों का पालन ही वह मापदंण्ड था जिससे भारत को विश्व में विश्वगुरू का स्थान प्राप्त हुआ सतयुग में प्रभु श्रीराम ने जहां अपने पिता महाराजा दशरथ द्वारा कैकेयी को दिये गये वचन को पूर्ण करने हेतु 14 वर्ष के वनवास को हंसते-हंसते स्वीकार कर पुत्रधर्म का निर्वहन किया वहीं उनकी कर्तव्यपरायणता ने समाज में उन्हें प्रभू श्रीराम् के रूप में स्थापित किया।

महाभारतकालीन एकलव्य की गुरूदक्षिणा ने विश्व में उन्हें सबसे महान शिष्य का स्थान प्रदत्त किया जिन्होंने गुरूदक्षिणा के रूप में तत्काल अपने अंगूठे को काटकर गुरू द्रोणाचार्य के कदमों में भेंट चढ़ाने में तनिक भी संकोच नहीं किया जो गुरू शिष्य परम्परा के निःस्वार्थ प्रेम व एकलव्य की कर्तव्यपरायणता का सर्वोच्च उदाहरण हैं।

महाराजा भागीरथी की कर्तव्यपरायणता ने ही उन्हें अजर-अमर कर दिया जिन्होंने अपने पुररवों को मुक्ति देने हेतु घोर तपस्या कर स्वर्ग से मोक्षदायिनी गंगा को धरती पर लाकर अपने पुरखो की मुक्ति देने का कार्य किया, वही मोक्षदायिनी गंगा आज भी साक्षात् भारतवर्ष के नागरिकों के लिये सतत् रूप से मोक्षदायिनी बनी हुयी हैं।

श्रवण कुमार जहां अपने नेत्रहीन माता-पिता को कन्धे पर बैठाकर देशाटन कराने के दौरान तीर लगने से हुयी मृत्यु से अमरता को प्राप्त हुये वहीं उनकी मातृ-पितृ भक्ति में निर्वाहित कर्तव्यों ने उनके प्रेम को श्रवण प्रेम के रूप में स्थापित कर दिया।

महाराजा दधिची द्वारा अपने शरीर का वज्र बनाने हेतु दिया गया दान विश्व में अलौकिक व अनूठा दान हैं। वहीं कर्ण द्वारा अपने कवच- कुंण्डल जो कि अलौकिक शक्तियों से भरे हुये थे एवं कर्ण की सुरक्षा हेतु अतिआवश्यक थे का दान भी कर्तव्यपरायणता का अनुपम उदाहरण हैं जिनके द्वारा सामाजिक प्रतिमान स्थापित किये गये।

भारत का इतिहास प्राचीनकाल से ही देशसेवा के लिये पृथ्वीराज चैहान, महाराणा प्रताप, रानीलक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना, स्वामी विवेकानन्द, लालबहादुर शास्त्री, जैसे कर्तव्यपरायण भारतवासियों की शौर्यगाथाओं से भरा है जिन्होंने अपनी कर्तव्यपरायणता से ना केवल विश्व में भारत का स्थान शिखर पर स्थापित किया अपितु अमरत्व भी प्राप्त किया।

इसी प्रकार हम देखते हैं कि अधिकारों की प्राप्ति से जहां व्यक्ति में शक्ति सन्निहित होती हैं वहीं कर्तव्यों के पालन-मात्र से व्यक्ति महानता को प्राप्त होता है। प् ।ड श्र।ळत्न्ज्ञ अभियान का मुख्य उद्देश्य भारत के नागरिकों को उनके शौर्यपूर्वा इतिहास का ध्यान दिलाते हुये अपने कर्तव्यों के पालन से भारत को पुनः विश्वगुरू के रूप में स्थापित करना हैं।

कर्तव्यों के प्रकारः सामान्यः

कर्तव्यों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

  1. सामाजिक / नैतिक कर्तव्य
  2. संवैधानिक कर्तव्य।

 

  1. सामाजिक / नैतिक कर्तव्यः
    रोजमर्रा की जिन्दगी में समाहित कार्यों को करने के दौरान क्षणिक सांध्यान देने मात्र से जिन कार्यों को किया जा सकता है उन्हें हम सामाजिक/ नैतिक कर्तव्यों की संज्ञा दे सकते है यथा,
    विकलांग/ बुजुर्गों के लिये सीट छोड़ देना, एम्बुलेन्स के लिये रास्ता देना एवं दिलवाना, पानी के अनावश्यक व्यय को रोकना, सफाई व्यवस्था में सहयोग। आदि।
  2. संवैधानिक कर्तव्यः
    भारत के संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों के साथ-साथ मूल कर्तव्यों का विशेष रूप से उपबंध किया गया है। इस हेतु भारत के संविधान में 42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा संविधान के भाग 4 के पश्चात् एक नया भाग 4-क अनुच्छेद 51 (क) जोडा़ गया जिसके द्वारा पहली बार संविधान में नागरिकों के मूल कर्तव्यों को समादिष्ट किया गया है जिनके अनुपालन के प्रति भारत के प्रत्येक नागरिक को जागरूक करना प् ।ड श्र।ळत्न्ज्ञ का मुख्य उद्देश्य हैं। यह अनुच्छेद 51 (क) दिनांक 3.1.1977 से प्रभावी है। इससे पूर्व संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है परन्तु मूल कर्तव्यों का समावेश नहीं था जबकि अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित होते है। इस 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में इसी कमी को दूर किया गया है तथा नये अनुच्छेद 51(क) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक के निम्न मूल कर्तव्य हैं जिनका पालन करना होगा-

 

  1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें
  2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करके वाले उच्च आदर्शों को हृदय से संजोए रखें और उनका पालन करें
  3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और अक्षुण रख
  4. देश की रक्षा करें और अखंडता की रक्षा करें और आह्मन किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें,
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म,भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध है,
  6. हमारी सामाजिक (composite) संस्कृति को गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें,
  7. प्राकृतिक पर्यावरण को जिसके अन्तर्गत वन,झील,नदी और वन्यजीव भी हैं, रक्षा करें, उनका संवर्द्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रख
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण,मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें
  9. सार्वजिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहें
  10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सत्त प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू लें,
  11. 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा मूल कर्तव्यों के अध्याय में यह कर्तव्य जोड़ा गया है कि “छः वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु के बालकों के माता-पिता और प्रतिपालन के संरक्षकों का यह कर्तव्य होगा कि वे उन्हें शिक्षा का अवसर प्रदान करें

नागरिकों द्वारा उक्त मूल कर्तव्यों का समुचित पालन किया जायें, इसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक होगा कि उसके विषय में उन्हें पूरी जानकारी हो । भारत की अधिकांश जनता निरक्षर है और उन्हें संविधान द्वारा प्रदत्त कर्तव्यों का कोई ज्ञान नहीं है। इसके लिए यह आवश्यक है कि उन्हें इसके विषय में जानकारी दिलायी जाये। जिसके लिए “आई एम जागरूक” अभियान योजनाबद्ध रूप से विभिन्न चरणों में कार्य कर रहा है एवं समाज के माध्यम से गौरवशाली भारत के पुर्ननिर्माण हेतु निरन्तर प्रयत्नशील हैं।

आइये समृद्ध एवं गौरवशील भारत के पुर्ननिर्माण हेतु कर्तव्यमात्र के पालन का संकल्प ले इस अभियान से जुड़ें।

 

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